रेणुकाजी: कुदरती खूबसूरती है जहां
दिल्ली से करीब 300 किमी दूर पर एक ऐसी दुनिया है, जो शहरों की भीड़-भाड़ से बिल्कुल अलग है। हिमाचल प्रदेश की ओर आपने कई बार रुख किया होगा। शिमला मनाली जैसे कई हिल स्टेशन पर गए होंगे, लेकिन वहां प्रकृति से न जुड़ पाने का मलाल रहा होगा। अगर सचमुच आप प्रकृति को करीब से छूना चाहते हैं, उसे महसूस करना चाहते हैं तो हिमाचल में एक ऐसा ही ऑफबीट डेस्टिनेशन है रेणुकाजी
सामान्य झीलों की तरह यहां पर भी आप बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। आप जैसे ही बोटिंग के लिए अपने कदम बढ़ाएंगे तो आपसे सबसे पहले अपने जूते दूर उतारने को कहा जाएगा। दरअसल इस झील के धार्मिक महत्व होने के कारण आप जूते-चप्पल पहनकर बोटिंग नहीं कर सकते। माना जाता है कि परशुराम की माता रेणुकाजी ने इसी झील में जल समाधि ली थी। बोटिंग करते हुए आप बहुत सी अलग-अलग तरह की मछलियों को भी देख पाएंगे। अगर आप उनके लिए कुछ चारा लेते हैं तो देखेंगे कि कैसे पानी में चारा डालते ही बहुत सी छोटी बड़ी मछलियां आपके पास आ जाती हैं।
साफ पानी में इन मछलियों की खूबसूरती देखते ही बनती है। भले ही आपने इससे पहले एक्वेरियम में मछलियां देखीं हों, मगर उजले पानी में इन आजाद इठलाती मछलियों को ऐसे देखना किसी रोमांच से कम नहीं। झील के विभिन्न किनारों पर मछलियों को दाना देने के लिए सैलनियों की भीड़ देखी जा सकती है। मछलियां आपस में मानों झगड़ रहीं हों कि मैं आगे रहूंगी। झील देखने के लिए यहां कोई शुल्क नहीं है।
यदि आप ने चिड़ियाघर देखना है तो उसके लिए आपका प्रति व्यक्ति 50 रुपए चुकाने होते हैं। झील के किनारे बने इस छोटे से चिड़ियाघर को नाम दिया गया है मिनी जू। इसमें तीन ही जानवार आप देख पाएंगे। शेर भालू और तेंदुआ। अच्छी बात यह है कि कम जानवरों के कारण यहां कोई रोक टोक नही, आप आराम से उन्हें निहार भी सकते हैं और अपने मन माफिक उनकी तस्वीर भी खींच सकते है। समुद्र तल से 660 मीटर की ऊंचाई पर, और दिल्ली के समीप यह अपनी परिक्रमा में ढाई किमी लम्बी है, जो शायद पूरे हिमाचल में सबसे बढ़ी है।
पैदल ट्रेक पर कुछ भी खाने-पीने की वस्तु साथ लेकर न चलें। दरअसल यहा बंदरों व लंगूरों की टोली इसी फिराक में रहती है कि उन्हें कुछ खाने के लिए दिख जाए। ऐसी कोई घबराने की जरूरत नहीं, मगर सावधानी से ट्रेकिंग का मजा दोगुना हो जाएगा। श्रद्धालु यहां झील की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं, वहीं युवाओं में ट्रेकिंग का जूनून होता है। एक से बढ़कर एक नजारे देख कर आप रोमंचित हुए बगैर नहीं रह पाएंगे। झील के बोटिंग प्वॉइंट से जैसी ही आप परिक्रमा के लिए आगे बढ़ते हैं, वहां एक बड़े आकार का कछुआ सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। जैसे उसे कुछ खाने के लिए दिया जाता है, वह पानी से बाहर आता है फिर झील में कहीं ओझल हो जाता है।
झील की सतह पर कमल के फूल अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कहा जाता है कि इस झील की आकृति किसी महिला जैसी है। इस झील की महिला जैसी आकृति कैसे दिखे, इसके लिये आपको यहां से लगभग 8 किमी और ऊपर की तरफ जामु चोटी पर जाना होगा। इस चिड़ियाघर के साथ ही लगा हुआ सरंक्षित वन्य क्षेत्र भी है। यहां आप सफारी भी कर सकते हंै और यदि भाग्यशाली हुए तो कई प्रकार के जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक परिवेश में भी देख सकते हैं।
इसके अलावा झील से कुछ ही कदमों की दूरी पर रेणुका जी मंदिर भी है। श्रद्धालु यहां भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। प्रबोधिनी एकादशी की पूर्व संध्या पर पांच दिन का मेला भी लगता है। माना जाता है कि इन दिनों मां रेणुकाजी से मिलने उनके पुत्र भगवान परशुराम पहुंचते हैं। पांच दिवसीय मेले के दौरान यहां देश भर से कई लाख भक्त भगवान परशुराम व उनकी मां रेणुका जी के दिव्य मिलन के पवित्र अवसर को देखने के लिए यहां आते हैं।
पूरा क्षेत्र कुदरती खूबसूरती से सरोबार है, हालांकि सैलानी हिमाचल के इस पूर्वी भाग में अपेक्षाकृत कम ही नजर आते है। कम ऊंचाई और सम्पर्क के सीमित साधन सम्भवत: इसका कारण हो सकते हैं, अन्यथा नाहन और उसके आस-पास का भू भाग किसी भी तरह से हिमाचल के दूसरे हिस्सों से खूबसूरती में कम नहीं।
कैसे पहुंचे: दिल्ली से नाहन होते हुए आप रेणुकाजी पहुंच सकते हैं। आप चाहें तो पौंटा सहिब से होते हुए भी रेणुकाजी पहुंच सकते हैं। दिल्ली से रेणुकाजी की दूरी करीब 300 किमी. है। बस से आप नाहन या पौंटा साहिब पहुंच कर आगे के लिए टैक्सी या बस ले सकते हैं। नजदीकी रेलेवे स्टेशन अम्बाला है, जहां 95 किमी आगे रेणुकाजी है।
कहां ठहरें: यहां छोटे बड़े गेस्ट हाउस के अलावा हिमाचल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी हैं, जहां आप ऑनलाइन भी बुकिंग करवा सकते हैं।


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